2000 करोड़ फूंके, 40 साल बीते – फिर भी नहीं चली ट्रेन! नांगल से तलवाड़ा लाइन का अधूरा पड़ा काम

Railway Line Work Stopped: आपको बता दें ये जो नांगल बांध से तलवाड़ा तक ट्रेन की लाइन बिछाने वाली योजना है, ये पिछले करीब 40 साल से आधी-अधूरी ही लटकी पड़ी है. अब तक सरकार ने इसमें 2000 करोड़ से ऊपर लगा भी दिए, लेकिन काम अभी तक पूरा नहीं हुआ. गांव के लोग बूढ़े हो गए – बेटे-बेटियों की शादियां भी हो गईं – लेकिन ट्रेन की सीटी आज तक नहीं सुनाई दी. अब जानते हैं काम कहां अटका है, क्या वजह रही और क्या अब भी उम्मीद बची है.

Railway Line Work Stopped
Railway Line Work Stopped

कब से चला आ रहा है ये सपना

सबसे पहले इस रेल लाइन का आइडिया 1981-82 में आया और 1985 में काम शुरू भी हो गया था. मकसद था – पंजाब और हिमाचल के गांवों को सीधा रेलवे से जोड़ देना. भाई नांगल डैम, दौलतपुर चौक, तलवाड़ा और मुकेरियां होते हुए रेल पटरी बिछनी थी. लेकिन 4 दशक गुजर गए, ट्रेन अब तक सही से नहीं चली पूरे ट्रैक पर.

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थोड़ा बना, थोड़ा फंसा पड़ा है

अब तक कुल 60 किलोमीटर तक पटरी बिछ चुकी है, जिसमें नांगल से दौलतपुर चौक तक के स्टेशन तैयार हैं और वहां ट्रेन भी चल रही है. असली पेंच बाकी के 23.7 किलोमीटर में फंसा है, जो दौलतपुर से तलवाड़ा तक है. यहां खासकर दो-तीन किलोमीटर की जमीन ऐसी है जिस पर आज तक सरकार ठीक से कब्जा नहीं ले पाई, और किसान लोग भी अपनी बात पर अड़े हैं.

जमीन का झगड़ा बन गया सबसे बड़ा रोड़ा

इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी अड़चन है – जमीन का झंझट. पंजाब सरकार को रेलवे को करीब 72 हेक्टेयर जमीन देनी है. लेकिन किसानों को लग रहा है कि उनके साथ नाइंसाफी हुई. हिमाचल वाले किसानों को एक मरला का मुआवजा करीब ₹1 लाख मिला और पंजाब के किसानों को ₹8,500 ही. अब बताओ, कोई देने को तैयार होगा?…बस यहीं से मामला कोर्ट-कचहरी में चला गया.

कागज़ी फाइलों और पेड़-पौधों पर भी अटका पड़ा है

मुआवजे की लड़ाई के साथ-साथ पर्यावरण विभाग की भी बहुत सारी मंजूरी बाकी है. जहां-जहां पेड़ हैं, वहां काटने की इजाजत नहीं मिल रही. बिजली के खंभे हों या तार – वो हटाने में भी देर की जा रही है. ऐसे में रेलवे, राज्य सरकार और केंद्र आपस में फाइलें घुमा रहे हैं और काम वहीं अटका पड़ा है.

इतना पैसा खर्च, फिर भी अधूरा सपना

अब तक करीब-करीब दो हजार करोड़ रुपए इस लाइन पर खर्च हो चुके हैं. लेकिन मजे की बात, ट्रेन अभी उस रास्ते से नहीं गुजर पा रही. गांव के लोग कहते हैं – “हमारे दादा भी इस लाइन का सपना लेकर बैठे थे, अब हमारे पोते हो गए, पर ट्रेन अभी तक पहुंची ही नहीं.”

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